से युक्त होना sentence in Hindi
pronunciation: [ s yuket honaa ]
"से युक्त होना" meaning in English
Examples
- सभी करार और संविदाओं के लिये लिखित, पंजीकृत और गवाहों की गवाही से युक्त होना आवश्यक नहीं है परन्तु ऐसी संविदा अन्य सब गुणों के रहते हुए भी इन औपचारिकताओं के अभाव के कारण मान्य नहीं होती।
- इसके पीछे उनकी बलिष्ठ देहयष्टि और निष्ठा भाव तो था ही, साथ ही साथ वारेन हैस्टिंग्स के ही शब्दों में ÷ सेना का उच्च वर्ण केलोगों से युक्त होना कम्पनी शासन को वैधता भी प्रदान करता था।
- सभी करार और संविदाओं के लिये लिखित, पंजीकृत और गवाहों की गवाही से युक्त होना आवश्यक नहीं है परन्तु ऐसी संविदा अन्य सब गुणों के रहते हुए भी इन औपचारिकताओं के अभाव के कारण मान्य नहीं होती।
- नैतिकता, सदाचार, कर्तब्य, क्षमा, दान तथा विश्व कल्याण की इच्छा सभी को देने के लिए धर्म क़ा उपयोग किया गया है तथा ध्यान योग के साधक को भी इन तीनो गुणों से युक्त होना चाहि ए.
- किसी को ‘चमार ' कहना इसीलिए आहत करता है कि उसका आशय आजके समता मूलक समाज में पल रहे एक जाति विशेष के सदस्य से नहीं है बल्कि ऐसे अवगुणों से युक्त होना है जो आज का चमार जाति का व्यक्ति भी धारण करना नहीं चाहेगा।
- महात्मा कहलाने के लिए योग-साधना अथवा आधयात्मिक क्रियाओं से युक्त होना मात्र ही पर्याप्त नहीं होता, आध्यात्मिक क्रियाओं के साथ-साथ ' तत्तवाज्ञान ' से युक्त होना-रहना चाहिए साथ ही साथ वैराग्यवान होते-रहते सेवा रूप धर्म-धर्मात्मा-धरती रक्षार्थ भगवद्शरणागत होना रहना-चलना भी अनिवार्यतः आवश्यक होता है ।
- किसी को ‘ चमार ' कहना इसीलिए आहत करता है कि उसका आशय आजके समता मूलक समाज में पल रहे एक जाति विशेष के सदस्य से नहीं है बल्कि ऐसे अवगुणों से युक्त होना है जो आज का चमार जाति का व्यक्ति भी धारण करना नहीं चाहेगा।
- महात्मा कहलाने के लिए मात्र योग-साधना अथवा आध्यात्मिक क्रियाओं से युक्त होना ही पर्याप्त नहीं है, आध्यात्मिक क्रियाओं के साथ-साथ तत्त्वज्ञान से युक्त होना-रहना चाहिए साथ ही साथ वैराग्यवान रहते हुये, सेवा रूप धर्म-धर्मात्मा-धरती की रक्षा के लिए भगवत शरणागत रहना भी आवश्यक होता है।
- गीता में ज्ञान और विज्ञान दोनों का विश्लेषण है, गीता का योग सहज हैं सतत आत्मवान होना और निराशी भाव से युक्त होना इसकी सामान्य भूमिका है आगे ४ श्लोकों में योग की सामान्य बातें है आगे के चार श्लोको मे योग की सामान्य बातें है ।
- मनु ने राजधर्म और व्यवहार के विषय में भी विस्तार से लिखा है | मनु और याज्ञवल्क्य दोनों ने अध्यात्मनिष्ठा को ही राज विधान का निर्माता माना है | उनके अनुसार शासक को त्याग, वैराग्य तथा सद्गुणों से युक्त होना चाहिये | आत्मनिष्ठा के अभाव में राजा व प्रजा में समता की भावना आ ही नहीं सकती | मनुस्मृति के अन्त में लिखा है “