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अगति sentence in Hindi

pronunciation: [ agati ]
"अगति" meaning in English  "अगति" meaning in Hindi  

Examples

  1. मैं गति के नियम पढाने की बात करती हूँ तो छात्र मजाक उड़ाते हुए कहते हैं कि गति के तीन प्रकार हैं, अगति, दुर्गति और सत्गति.
  2. दयालु ॠषि ने राजा की प्रेत योनि से मुक्ति के लिए स्वयं ही अपरा (अचला) एकादशी का व्रत किया और उसे अगति से छुड़ाने को उसका पुण्य प्रेत को अर्पित कर दिया।
  3. उदाहरणार्थ-ऊपर के अगीत का हिन्दी परिवर्तन-जीवन निरन्तर स्रजन का नाम है, स्रजन की निरन्तरता रुकने पर, जीवन ठहर जाता है: ठहरना अगति है, गति बिना-जीवन कहां रह पाता है ।
  4. आधुनिक खगोलवेत्ता अभी भी खगोलीय वस्तुओं की स्थिति, चमक, अगति तथा अन्य पर्यवेक्षण योग्य विशेषताओं के अध्ययन तथा खगोलीय मेकानिक्स के नियमों के आधार पर उनकी गति के बारे में भविष्यवाणी करने में लगे हैं।
  5. इस अस्ति और नास्ति के खेल में जूझता व्यक्ति किस घाट का पानी पिये? गजब स्थिति हो गयी है-“कुछ ऐसी लूट मची जीवन चौराहे परखुद को ही खुद लूटने लगा हर सौदागर।”तो कैसे मुक्ति हो इस अगति से?खुद के सवाल में खुद ही जवाब हाजिर होता है हमारे सामने।
  6. एक योगी उतना ही जानता है जहाँ तक उसने योग का अभ्यास किया है परंतु अर्जुन की दृष्टि में श्रीकृष्ण साक्षात भगवान हैं, बिना अभ्यास-श्रम के सर्वत्र सब कुछ जानने वाले अन्तर्यामी सच्चिदानंद घन परब्रह्म परमात्मा हैं, संपूर्ण प्राणियों की गति-अगति को जानने वाले हैं।
  7. क्षिणोदर्क अगति में जीव पुन: पुण्यात्मा के रूप में मृत्यु लोक में आता है और संतों सा जीवन जीता है, भूमोदर्क में वह सुखी और ऐश्वर्यशाली जीवन पाता है, तृतीय अगति में नीच या पशु जीवन और चतुर्थ गति में वह कीट, कीड़ों जैसा जीवन पाता है।
  8. क्षिणोदर्क अगति में जीव पुन: पुण्यात्मा के रूप में मृत्यु लोक में आता है और संतों सा जीवन जीता है, भूमोदर्क में वह सुखी और ऐश्वर्यशाली जीवन पाता है, तृतीय अगति में नीच या पशु जीवन और चतुर्थ गति में वह कीट, कीड़ों जैसा जीवन पाता है।
  9. ऊपर उठती जमीन, ऊपर उठते कगार उठती है सड़क पुल से होती हुई हमवार, और भी ऊपर सड़क उठती है हवा में घुसती आकाश में जैसे तलवार और लटक जाती है अगति के अधर में निराधार निर्लिप्त, निरानन्द, निश्चल, रक्ताक्त! आ गयी लो गंगा त्रिभुवनतारिणी! विश्व-वमन-धारिणी, रोग-शोक-कारिणी, रौरव-विहारिणी!
  10. निश्चय ही इस उपन्यास में ग्रामीण समाज की अनाधुनिक पितृ-सत्ता का एक अच्छा चित्रा प्रस्तुत किया गया है, जिसकी वजह से औरतों को सडक की पटरी पर दोनों ओर गठरियों के रूप में दिखलाना तथा बेला के अलावा स्त्राी-पात्राों का टोटा होना, उस ग्रामीण जीवन की विडम्बना को सामने लाता है जो अपनी रमणीयता के बावजूद बेहद अगति से चिपटा हुआ रहता आया है।
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