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रोग कारक sentence in Hindi

pronunciation: [ roga kaarek ]
"रोग कारक" meaning in English  

Examples

  1. टिक्का रोग कारक जीवाण सरकोस्फोरा सिसमी लक्षण एवं क्षति इस रोग में पत्तियों पर छोटे अनियंत्रित भूरे धब्बे बनते है जो बाद में बड़े हो जाते है।
  2. शनि नैसर्गिक रूप से रोग कारक ग्रह है और जन्मकुंडली का अष्टमेश भी है अतः अष्टमेश के नक्षत्र में स्थित राहु की महादशा में ' ' आपरेशन ' का कष्ट भोगना पड़ा।
  3. लग्न में राहु व शनि की युति हो तो यह स्थिति रोग कारक होती है, परंतु यही युति यदि केंद-त्रिकोण में मकर राशि में हो तो शुभ फलदायी होती है।
  4. (२) घंटों ज़िंदा रह सकते हैं हाथों पर रोग कारक जरासीम (GERMS, रोगाणु) Maine Medical Center के अनुसार हाथों को बारहा साफ़ करते रहिये साबुन पानी से क्योंकि रोगाणु तीन घंटों तक सक्रिय और असरकारी बने रह सकते हैं।
  5. यदि व्यक्ति के नामराशि से नगर या मोहल्ले की नामराशि 2, 5, 9, 10 या 11 वीं हो तो शुभ, 1 व 7 हो तो शत्रु 4, 8 या 12 हो तो रोग 3, 6 हो तो रोग कारक समझना चाहिये।
  6. अशुभ अर्थात् रोग कारक ग्रहों की महादशा, अंतर्दशा, प्रत्यंतर दशा, लग्न, लग्नेश, मेष राशि व मंगल पर शनि, राहु, केतु व षष्ठेश का प्रभाव युति या दृष्टि के द्वारा हो, तो जातक या जातका को मस्तिष्क का कैंसर होता है।
  7. नक्षत्र 12 से 15 तक 13 मास 10 दिन तक का समय कष्टकारक, नक्षत्र 16 से 18 तक 10 मास का समय उŸाम राज-यश कारक होगा, नक्षत्र 19 से 20 तक 6 मास 20 दिन का समय सुखदायक तथा नक्षत्र 21 से 22 तक 6 मास 20 दिन तक का समय महाकष्ट व वात रोग कारक होगा।
  8. एक ऐसे अन्वेषण में जो एड्स के इलाज़ को और असरदार बना सकता है, साइंसदानों ने इस बात का पता लगाया है, कैसे एड्स का आम विषाणु “ एच आई वी-१ ” (एड्स विषाणु की आम फ़हम रोग कारक स्ट्रेन) इस सिंड्रोम के प्रबंधन में सबसे ज्यादा स्तेमाल होने वाली दवा को बेअसर बना देता है.
  9. राहु की विशेषता राहु की विशेषता राहु छाया ग्रह है, ग्रन्थों मे इसका पूरा वर्णन है,और श्रीमदभागवत महापुराण में तो शुकदेवजी ने स्पष्ट वर्णन किया कि यह सूर्य से १० हजार योजन नीचे स्थित है,और श्याम वर्ण की किरणें निरन्तर पृथ्वी पर छोडता रहता है,यह मिथुन राहि में उच्च का होता है धनु राशि में नीच का हो जाता है,राहु और शनि रोग कारक ग्रह है,इसलिये यह ग्रह रोग जरूर देता है।
  10. राहु छाया ग्रह है, ग्रन्थों मे इसका पूरा वर्णन है, और श्रीमदभागवत महापुराण में तो शुकदेवजी ने स्पष्ट वर्णन किया कि यह सूर्य से १ ० हजार योजन नीचे स्थित है, और श्याम वर्ण की किरणें निरन्तर पृथ्वी पर छोडता रहता है, यह मिथुन राहि में उच्च का होता है धनु राशि में नीच का हो जाता है, राहु और शनि रोग कारक ग्रह है, इसलिये यह ग्रह रोग जरूर देता है।
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