तरणी sentence in Hindi
pronunciation: [ terni ]
Examples
- यहीं हुए भवभूति नाम संस्कृत के कविवर उत्तार रामचरित्र ग्रंथ है जिनका सुंदर वोपदेव से यहीं हुए हैं वैयाकरणी है जिनका व्याकरण देवभाषा निधि तरणी नागार्जुन जैसे दार्शनिक और सुकवि ईशान से कोशल विदर्भ के मध्य में हुए उदित शशिभान से।
- वे एक कविता में ‘ बह रही मृत्यु के सागर में जीवन की छोटी-सी तरणी ' कहते हैं मगर उन्हें यह भी विश्वास है कि ‘ मैं मर जाऊंगा पर मेरे जीवन का आनंद नहीं / झर जाएंगे पत्र-कुसुम, पर मधुप्राण वसंत नहीं. '
- प्राण! मैं तो मार्गदर्शक एक तारा चाहता हूँ, मैं तुम्हारी मौन करुणा का सहारा चाहता हूँ, यह उठा कैसा प्रभंजन जुड़ गयी जैसे दिशायें, एक तरणी एक नाविक और कितनी आपदाएँ, क्या कहूँ मँझधार में ही मैं किनारा चाहता हूँ, मैं तुम्हारी मौन करुणा का सहारा चाहता हूँ,
- सरस घनश्याम आ जाओ तरणी के ताप से व्याकुल दिशाएं तप रहीं लू से हवाएं गर्म चलती हैं निराश्रित वृद्ध सी दोपहर कुँवारी साध सी ढलती बढ़ी आती है गर्मी अब सरासर सीढियां चढ़तीं ये कैसी उठ रही लपटें असहनीय दर्द सी चुभती उधर अम्बर सुलगता है धरा पर आंधियाँ चलतीं
- सरस घनश्याम आ जाओ तरणी के ताप से व्याकुल दिशाएं तप रहीं लू से हवाएं गर्म चलती हैं निराश्रित वृद्ध सी दोपहर कुँवारी साध सी ढलती बढ़ी आती है गर्मी अब सरासर सीढियां चढ़तीं ये कैसी उठ रही लपटें असहनीय दर्द सी चुभती उधर अम्बर सुलगता है धरा पर आंधियाँ चलतीं...
- जो स्वयं नश्वर है, वह अधम शरीर शाश्वत धाम कैसे देगा?उन शरीरों में से गाय का भी एक शरीर है, वह शाश्वत सनातन कैसे बन जायेगी? आश्चर्य है कि स्मृतियों और पुराणों में गाय की पूंछ पकड़कर उस वैतरणी को पार करने का विधान है जिसमें कोई तरणी काम नहीं करती।
- जो स्वयं नश्वर है, वह अधम शरीर शाश्वत धाम कैसे देगा?उन शरीरों में से गाय का भी एक शरीर है, वह शाश्वत सनातन कैसे बन जायेगी? आश्चर्य है कि स्मृतियों और पुराणों में गाय की पूंछ पकड़कर उस वैतरणी को पार करने का विधान है जिसमें कोई तरणी काम नहीं करती।
- जो स्वयं नश्वर है, वह अधम शरीर शाश्वत धाम कैसे देगा? उन शरीरों में से गाय का भी एक शरीर है, वह शाश्वत सनातन कैसे बन जायेगी? आश्चर्य है कि स्मृतियों और पुराणों में गाय की पूंछ पकड़कर उस वैतरणी को पार करने का विधान है जिसमें कोई तरणी काम नहीं करती।
- कुएँ की पनिहारिन भी हँस पड़ी और सबसे बढ़कर नदी की संतान केवट मुँह पर से रूमाल फेंककर मुक्तकंठ से ठहाका लगाकर हँस पड़ा कि उसकी बोझी नौका अब ऊपर हो गयी, अब यह नदी का अगम जल ही तरणी का सुगम मार्ग बन गया, अब उसकी नाव गंतव्य दिशा की ओर बाणवेग से छूटेगी।