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जाँ निसार अख़्तर sentence in Hindi

pronunciation: [ jaan nisaar akheter ]

Examples

  1. ये शेर बतौरे ख़ास मरहूम जाँ निसार अख़्तर का याद दिलाता है जो फिल्मी शायरी की तारीख़ में बकौल उनके सबसे सेक्सी गीत रहा है, लेकिन उसपर कोई उँगली नहीं उठा सकाः रात पिया के संग जागी रे सखि चैन पड़ा जो अंग लागी रे सखि.
  2. जाँ निसार अख़्तर जब मुज़तर का संग्रह तैयार कर रहे थे तो उन्हें ग़ज़ल की डायरी में यह ग़ज़ल मिली थी, लेकिन इसके बावजूद पढ़ने वाले ग़ज़ल के मिज़ाज को ज़फ़र के इतिहास से जब जोड़कर देखते हैं तो उन्हें इसमें आख़िरी मुग़ल की हिकायत नज़र आती है.
  3. मुझे आश्चर्य होता है कि जाँ निसार अख़्तर पर Romance का जो एक क़ुदरती रंग सबसे ज़्यादा छाया रहा और जिसकी ही असल में सबसे ज़्यादा प्रशंसा और तारीफ़ होनी चाहिए थी कि जिसमें तसव्वुफ़ भी शामिल है उनको उस ढंग से समझने बूझने की कोशिश क्यों नहीं कि गई? यह चेहरा क्यूँ छिपाया गया था फिर इस अख़्तर के साथ ऐसा क्यूँ किया गया?
  4. मिर्ज़ा दाग़ देहलवी के शागिर्द जनाब नारायण प्रसाद मेहर को शायरी में अपना उस्ताद मानने वाले जाँ निसार अख़्तर ने 1947 के सितम्बर महीने में मज़हवी दंगों की वजह से पहले ग्वालियर के कॉलेज के उर्दू के प्रोफ़ेसर की नौकरी छोड़ी फिर भोपाल गए और वहाँ पर कुछ अरसा हमीदिया कॉलेज में उर्दू के प्रोफे़सर रह और अन्ततः 1948 में उस नौकरी से भी इस्तीफ़ा देकर मुम्बई चले आए।
  5. और बनती थीं कई अनमोल रचनाएं. मधुकर राजस्थानी, शमीम जयपुरी, अमीक़ हनफ़ी, सुदर्शन फ़ाकिर, उध्दवकुमार, रमानाथ अवस्थी, जाँ निसार अख़्तर, वीरेंद्र मिश्र, नीरज जैसे कई लब्ध-प्रतिष्ठित रचनाकारों से बाक़यदा गीत-ग़ज़ल लिखवाइ जातीं थी. के महावीर, मुरली मनोहर स्वरूप, रमेश नाडकर्णी, सतीश भाटिया जैसे गुणी मौसिकार इन रचनाओं को संगीतबध्द करते और रेडियो सुरीला हो जाता. न कैसैट्स मिलते थे और न सीडीज़...
  6. ज़माना आज नहीं / जाँ निसार अख़्तर ज़माना आज नहीं डगमगा के चलने का सम्भल भी जा कि अभी वक़्त है सम्भलने का बहार आये चली जाये फिर चली आये मगर ये दर्द का मौसम नहीं बदलने का ये ठीक है कि सितारों पे घूम आये हैं मगर किसे है सलिक़ा ज़मीं पे चलने का फिरे हैं रातों को आवारा हम तो देखा है गली गली में समाँ चाँद के निकलने का तमाम नशा-ए-हस्ती तमाम कैफ़-ए-वजूद वो इक लम्हा तेरे जिस्म के पिघलने का
  7. सुना है हो भी चुका है फ़िरक़-ए-ज़ुल्मत-ए-नूर सुना है हो भी चुका है विसाल-ए-मंज़िल-ओ-गाम बदल चुका है बहुत अहल-ए-दर्द का दस्तूर निशात-ए-वस्ल हलाल-ओ-अज़ाब-ए-हिज्र-ए-हराम जिगर की आग, नज़र की उमंग, दिल की जलन किसी पे चारा-ए-हिज्राँ का कुछ असर ही नहीं कहाँ से आई निगार-ए-सबा, किधर को गई अभी चिराग़-ए-सर-ए-रह को कुछ ख़बर ही नहीं अभी गरानि-ए-शब में कमी नहीं आई नजात-ए-दीद-ओ-दिल की घड़ी नहीं आई चले चलो कि वो मंज़िल अभी नहीं आई बदन की प्यास, बदन की शराब मांगे है-मशहूर गीतकार और शायर जाँ निसार अख़्तर की चार ग़ज़लें
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