स्पृश्य meaning in Hindi
pronunciation: [ seprishey ]
Examples
- पहली दृष्टि के चरम अभिव्यक्ति हम जातीय सोपान पर आधारित भारत की सामाजिक संरचना में देख सकते हैं-द्विज और शुद्र , स्पृश्य और अस्पृश्य के बीच जन्मजात विभाजन की उत्पीड़क सामाजिक व्यवस्था जिसमें जन्म से निर्धारित जातीय अस्मिता अन्य सारी अस्मिताओं का दमन कर देती है.
- पहली दृष्टि के चरम अभिव्यक्ति हम जातीय सोपान पर आधारित भारत की सामाजिक संरचना में देख सकते हैं-द्विज और शुद्र , स्पृश्य और अस्पृश्य के बीच जन्मजात विभाजन की उत्पीड़क सामाजिक व्यवस्था जिसमें जन्म से निर्धारित जातीय अस्मिता अन्य सारी अस्मिताओं का दमन कर देती है.
- पहली दृष्टि के चरम अभिव्यक्ति हम जातीय सोपान पर आधारित भारत की सामाजिक संरचना में देख सकते हैं-द्विज और शुद्र , स्पृश्य और अस्पृश्य के बीच जन्मजात विभाजन की उत्पीड़क सामाजिक व्यवस्था जिसमें जन्म से निर्धारित जातीय अस्मिता अन्य सारी अस्मिताओं का दमन कर देती है .
- पहली दृष्टि के चरम अभिव्यक्ति हम जातीय सोपान पर आधारित भारत की सामाजिक संरचना में देख सकते हैं-द्विज और शुद्र , स्पृश्य और अस्पृश्य के बीच जन्मजात विभाजन की उत्पीड़क सामाजिक व्यवस्था जिसमें जन्म से निर्धारित जातीय अस्मिता अन्य सारी अस्मिताओं का दमन कर देती है .
- उन्हें ब्राह्रमण कहें कि शूद्र , अगड़ा कहें कि पिछड़ा, स्पृश्य कहें कि अस्पृश्य - कुछ पता नहीं| आज यह स्थिति पहले से भी बदतर हो गई है, क्योंकि अब जाति के नाम पर नौकरियॉं, संसदीय सीटें, मंत्री और मुख्यमंत्री पद, नेतागीरी और सामाजिक वर्चस्व आदि आसानी से हथियाएं जा सकते हैं।
- थलबुहारा उस जगह या उन जगहों को कहा जाता है जहाँ सब कुछ , भौतिक और अभौतिक दोनों , झाड़ दिया गया हो , हड़प लिया गया हो , मिटा दिया गया हो , निचोड़ लिया गया हो , उड़ा दिया गया हो . स्पृश्य धरती के सिवाय सब कु छ.
- थलबुहारा उस जगह या उन जगहों को कहा जाता है जहाँ सब कुछ , भौतिक और अभौतिक दोनों , झाड़ दिया गया हो , हड़प लिया गया हो , मिटा दिया गया हो , निचोड़ लिया गया हो , उड़ा दिया गया हो . स्पृश्य धरती के सिवाय सब कु छ.
- इसका कारण यह है कि इन माध्यमों के द्वारा यह तो संभव है कि अपने समाज का अस्पृश्य कहा जाने वाला यह वर्ग आर्थिक एवं राजनीतिक दृष्टि से शेष समाज के समकक्ष आ जाए किन्तु उससे तथाकथित स्पृश्य और अस्पृश्य कहे जाने वाले समाज-बन्धुओं के मध्य विद्यमान भावनात्मक खाईं को घटाया नहीं जा सकेगा।
- किन्तु आप दलित अछूतों के बारे में स्पृश्य हिन्दू समाज की यह धारणा बन चुकी है और वाक़ई सच भी है कि आपकी कोई मदद करने वाला नहीं है , आप लोगों के लिए कोई दौड़ कर आने वाला नहीं है , आप लोगों को रुपयों पैसों की मदद होने वाली नहीं है और न तो आपको किसी सरकारी अधिकारी की मदद होने वाली है।
- उन्होंने बताया कि हर प्रांत में हजारों-लाखों लोग अपनी फर्जी जातियॉं लिखवा देते हैं ताकि उनकी जातीय हैसियत ऊँची हो जाए| कुछ जातियों के बारे में ऐसा भी है कि एक प्रांत में वे वैश्य है तो दूसरे प्रांत में शूद्र| एक प्रांत में वे स्पृश्य हैं तो दूसरे प्रांत में अस्पृश्य ! हर जाति में दर्जनों से लेकर सैकड़ों उप-जातियॉं हैं और उनमें भी ऊँच-नीच का झमेला है।