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संवेद्य meaning in Hindi

pronunciation: [ senvedey ]
संवेद्य meaning in English

Examples

  1. एलर्जिक रियेक्संस , चमड़ी -शोथ ( डर-माँ -टा-ई -टिस ) , तथा प्रकाश के प्रति गोदना किये हिस्से की चमड़ी का संवेद्य होना ऐसे में कोई अनहोनी नहीं मानी जायेगी ।
  2. यह अस्मिता क्या है ? यदि इसे अनुभव-विषय के रूप में लें तो यह अन्य आन्तरविषयों के समान एक विषय होगी और तब यह वर्तमान में संवेद्य, अतीत मेंस्मरणीय और भविष्यत् में संभाव्य होगी.
  3. इसका परिणाम यह हुआ कि अलग-अलग वर्गों में अलग-अलग प्रकार की भाषा बोली जाती है और साहित्य-समीक्षा के क्षेत्रों में भी कई परिभाषाएँ हो गई हैं जो अपने-अपने व्यवहार करने वालों में परस्पर संवेद्य नहीं होती हैं।
  4. नाटक के क्षेत्र में इसकी जो प्रतिक्रिया हुई , उससे रचना में स्वानुभूति , आन्तरिकता और इन्द्रिय संवेद्य ज्ञान का महत्त्व बढ़ा ; नाटककार को तो जैसे एक सूत्र मिल गया : ‘ जो है , मैं उसे नहीं देखता।
  5. कश्मीर को अगर भारतीय राष्ट्र राज्य के जिस्म का सहज और संवेद्य हिस्सा बनाना है तो इलाज के नाम पर कसी हुई वे बड़ी-बड़ी पट्टियां हटानी होंगी जिनकी वजह से उसका हिलना-डुलना मुश्किल होता है और सहज रक्त संचार भी प्रभावित होता है .
  6. इस प्रयोग को जारी रखते हुए हम गैर दृश्य इंद्रीयानुभवों में से एक अर्थात सपश्र पर चर्चा करेंगे और उसी पर होगा इस सप्ताह का ऐसाइनमेंट- स्पर्श त्वचा से हासिल अनुभव है जो संवेद्य के निकटता की मांग करता है- खूब भौतिक निकटता।
  7. कश्मीर को अगर भारतीय राष्ट्र राज्य के जिस्म का सहज और संवेद्य हिस्सा बनाना है तो इलाज के नाम पर कसी हुई वे बड़ी-बड़ी पट्टियां हटानी होंगी जिनकी वजह से उसका हिलना-डुलना मुश्किल होता है और सहज रक्त संचार भी प्रभावित होता है .
  8. इस प्रयोग को जारी रखते हुए हम गैर दृश् य इंद्रीयानुभवों में से एक अर्थात सपश्र पर चर्चा करेंगे और उसी पर होगा इस सप् ताह का ऐसाइनमेंट- स् पर्श त् वचा से हासिल अनुभव है जो संवेद्य के निकटता की मांग करता है- खूब भौतिक निकटता।
  9. प्रक्रिया में आये हर भाव और विचार को समाजसापेक्ष रुप में उन्होंने गीत में बांधा , इसीलिए , नवगीत में प्रेमसंबंधों की इतनी सुंदर और अर्थपूर्ण अभिव्यक्ति हो पायी है जिसे यदि कोरे रुमान से जोड़कर सतही नारिये से न देखा जाये तो इस अभिव्यक्ति का रंग बेहद संवेद्य और मार्मिक है।
  10. / ईमान के संवेद्य पथ पर हम बढ़े / चाबुक हमें उतने पड़े / और जब चिल्ला उठे हम चीख़कर / उतने नसीहत-केंकड़े / हमको ज़बर्दस्ती खिलाये ही गये दुर्धर / ज़िन्दगी का खूब है गहरा चक्कर ! ' - काँप उठता दिल : रचनावली खण्ड - 2 , पृष्ठ - 55 - 56 से
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