शीतपित्त meaning in Hindi
pronunciation: [ shitepitet ]
Examples
- 52 शीतपित्त : - * अदरक का रस और शहद पांच-पांच ग्राम मिलाकर पीने से सारे शरीर पर कण्डों की राख मलकर , कम्बल ओढ़कर सो जाने से शीतपित्त रोग तुरन्त दूर हो जाता है।
- स्ट्राबेरी के अधिक सेवन से बीमार पड़ने वाले व्यक्तियों ( सससेप्टिल इण्डीब्युजुअलस ) में विषाक्त लक्षण पैदा होने पर तथा छपाकी अथवा शीतपित्त के समान दाने आने पर फ्रागैरिया विस्का औषधि का प्रयोग किया जाता है।
- बड़ी अरनी की जड़ को छाया में सुखाकर चूर्ण बनाकर 1 ग्राम चूर्ण , जीरे के 1 ग्राम चूर्ण के साथ शहद मिलाकर चाटकर खाने से शीतपित्त ( पित्त उछलना ) में बहुत लाभ होता है।
- पित्त वृद्धि - शरीर में पित्त के बढ़ने से बहुत से रोग हो जाते हैं , जैसे - पीलिया, शीतपित्त, रक्तपित्त, उल्टी, नकसीर, डकारें आना आदि| पित्त वृद्धि को रोकने के लिए गूलर के पके फलों का सेवन सुबह बिना कुछ खाए-पिए करें|
- त्वचागत विष प्रभाव जन्य लक्षण-त्वचा पर ताम्रवर्ण चकते , शीतपित्त, दाने, फुन्सी निकलना, खुजली, चर्म विस्फोट नीलिमा आदि के अतिरिक्त गले कीसुर-~ सुराहट, कमजोरी, श्वास कष्ट, सुस्ती, तीव्रज्वर अथवा शरीर का तापमानप्राकृत से भी कम ये सभी लक्षण अति भयंकर स्वरूप के लक्षण होते हैं.
- त्वचागत विष प्रभाव जन्य लक्षण-त्वचा पर ताम्रवर्ण चकते , शीतपित्त, दाने, फुन्सी निकलना, खुजली, चर्म विस्फोट नीलिमा आदि के अतिरिक्त गले कीसुर-~ सुराहट, कमजोरी, श्वास कष्ट, सुस्ती, तीव्रज्वर अथवा शरीर का तापमानप्राकृत से भी कम ये सभी लक्षण अति भयंकर स्वरूप के लक्षण होते हैं.
- अर्टिकेरिया त्वचागत रोगों के सर्वाधिक हठीला तथा दुःसाध्य रोग है , जिसकी उत्पत्ति दूषित आहार-विहार , खानपान , अत्यधिक तेल , चटपटे , मसालेदार खाद्य पदार्थ तथा तेज नमक-मिर्च , अचार , सर्द-गर्म भोजन से यह एलर्जी का रूप लेकर शीतपित्त या अर्टिकेरिया की उत्पत्ति करता है।
- चर्म ( त्वचा ) से सम्बंधित लक्षण- रोगी के सिर और दाढ़ी में दाद का बनना जिसमें बहुत ज्यादा पपड़िया सी बनती है , खुजली , छाजन जिनमें खुजली और जलन होती रहती है , शीतपित्त के कारण उत्पन्न फुंसियां आदि चर्मरोगों से सम्बंधित लक्षणों में काली सल्फ्यूरिकम औषधि का सेवन असरकारक रहता है।
- चर्म ( त्वचा ) से सम्बंधित लक्षण- रोगी के सिर और दाढ़ी में दाद का बनना जिसमें बहुत ज्यादा पपड़िया सी बनती है , खुजली , छाजन जिनमें खुजली और जलन होती रहती है , शीतपित्त के कारण उत्पन्न फुंसियां आदि चर्मरोगों से सम्बंधित लक्षणों में काली सल्फ्यूरिकम औषधि का सेवन असरकारक रहता है।
- नीम की जड़ की ताजी छाल और नीम के बीजों की गिरी 10 - 10 ग्राम दोनों को अलग-अलग ताजे पत्तों के रस में पीसकर एकत्रकर मिला दें , जब यह उबटन ( लेप ) की तरह हो जाये , जब प्रयोग में लाने से शरीर की मैल , खुजली , दाद , वर्षा तथा गर्मी में होने वाली फुन्सियां , शीतपित्त , शारीरिक दुर्गन्ध तथा पसीने में अधिक गंध का आना आदि रोगों में लाभ मिलता है।