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भामिनी meaning in Hindi

pronunciation: [ bhaamini ]
भामिनी meaning in English

Examples

  1. भामिनी विलास ८६ अर्थ - हे तरूवर ! आप फूलों, पत्तों और फलों का भार वहन करते हैं, लोगों की धूप की पीड़ा हरते हैं और उनके ठंड के कष्ट मिटाते हैं ।
  2. यह कविता पिछले साल भाई जोगेन्द्र सिंह जोगी जी को बेटी झलक के जन्मदिन पर दी थी और वंदना जी की बेटी भामिनी के जन्मदिन पर | आज यहाँ ब्लॉग में पोस्ट की है |
  3. यह कविता पिछले साल भाई जोगेन्द्र सिंह जोगी जी को बेटी झलक के जन्मदिन पर दी थी और वंदना जी की बेटी भामिनी के जन्मदिन पर | आज यहाँ ब्लॉग में पोस्ट की है |
  4. हे भामिनी ! हे राधे! तुम अब मेरे वक्ष पर अपने युगल स्थूल एवं कड़े स्तनों को रख मेरे साथ कामभोग में आसक्त हो जाओ और मेरी छाती को शीतल कर दो क्योंकि शीतल जल से पूरित घड़े को रखने से विरहताप अवश्य दूर होता है।
  5. हे भामिनी ! हे राधे ! तुम अब मेरे वक्ष पर अपने युगल स्थूल एवं कड़े स्तनों को रख मेरे साथ कामभोग में आसक्त हो जाओ और मेरी छाती को शीतल कर दो क्योंकि शीतल जल से पूरित घड़े को रखने से विरहताप अवश्य दूर होता है।
  6. उद्वेगों से अधिक स्वाद है जहाँ शांति , संयम में ; एक पात्र में जहाँ क्शीर , मधुरस दोनॉ संचित हैं , छिपे हुए हैं जहाम सूर्य-शशधर एक ही हृदय में ; जहाँ भामिनी नहीं मात्र प्रेयसी विमुग्ध पुरुश की , अम्र्त-दायिनी , बल-विधायिनी माता भी होती है .
  7. कौन भामिनी है , जो अंगज पुत्र और प्रियतम में किसी एक को लेकर सुख से आयु बिता सकती है कौन पुरन्ध्री तज सकती है पति के लिए तनय को ? कौन सती सुत के निमित्त स्वामी को त्याग सकेगी ? यह संघर्ष कराल ! उर्वशी ! बड़ा कठिन निर्णय है .
  8. तुलसीदासजी कहते हैं- जैसे सूर्य के बिना दिन , प्राण के बिना शरीर और चंद्रमा के बिना रात ( निर्जीव तथा शोभाहीन हो जाती है ) , वैसे ही श्री रामचंद्रजी के बिना अयोध्या हो जाएगी , हे भामिनी ! तू अपने हृदय में इस बात को समझ ( विचारकर देख ) तो सही।
  9. जरा ठहर , हे ! भद्रा भामिनी बस उन ठिठुरती कमलिनियों को किंकणी धुन दे कर ऐसे ही मत जगाना और कमल तो ठहरे कमल हैं वे तो यूँ ही किंजल उड़ाते रहते हैं उन्हें छेड़कर और मत उकसाना नहीं तो तेरी चुनरी चेष्टातुर हो कर भी उन्हें आवृत न कर पाएगी और असफल किन्तु प्रिय प्रयास पर तू खुद ही अनायास मुस्कायेगी ......
  10. जहाँ नहीं बमती कृशानु सुशमा कपोल , अधरॉ की, न तो छिटकती हैं रह-रह कर चिंगारियाँ त्वचा से; स्थापित जहाँ शुभेच्छु, समर्पित हृदय विनम्र त्रिया का, उद्वेगों से अधिक स्वाद है जहाँ शांति, संयम में; एक पात्र में जहाँ क्शीर, मधुरस दोनॉ संचित हैं, छिपे हुए हैं जहाम सूर्य-शशधर एक ही हृदय में; जहाँ भामिनी नहीं मात्र प्रेयसी विमुग्ध पुरुश की, अम्र्त-दायिनी, बल-विधायिनी माता भी होती है.
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