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बृहदारण्यक उपनिषद meaning in Hindi

pronunciation: [ berihedaarenyek upenised ]
बृहदारण्यक उपनिषद meaning in English

Examples

  1. याज्ञवल्क्य जो एक प्रमुख वेदांती दार्शनिक थे , बृहदारण्यक उपनिषद (बृहदारण्यक उपनिषद (४) ४२ ) में इस दर्शन के मूल स्वर को एक मरणासन्न व्यक्ति के स्पृहणीय वर्णन द्वारा प्रस्तुत करते हैं, क्योंकि उनका मत था कि वह मरता हुआ व्यक्ति शरीर के बंधन से उत्तरोतर छुटकारा प्राप्त करता जा रहा है।
  2. याज्ञवल्क्य जो एक प्रमुख वेदांती दार्शनिक थे , बृहदारण्यक उपनिषद (बृहदारण्यक उपनिषद (४ ) ४२ ) में इस दर्शन के मूल स्वर को एक मरणासन्न व्यक्ति के स्पृहणीय वर्णन द्वारा प्रस्तुत करते हैं , क्योंकि उनका मत था कि वह मरता हुआ व्यक्ति शरीर के बंधन से उत्तरोतर छुटकारा प्राप्त करता जा रहा है।
  3. याज्ञवल्क्य जो एक प्रमुख वेदांती दार्शनिक थे , बृहदारण्यक उपनिषद (बृहदारण्यक उपनिषद (४ ) ४२ ) में इस दर्शन के मूल स्वर को एक मरणासन्न व्यक्ति के स्पृहणीय वर्णन द्वारा प्रस्तुत करते हैं , क्योंकि उनका मत था कि वह मरता हुआ व्यक्ति शरीर के बंधन से उत्तरोतर छुटकारा प्राप्त करता जा रहा है।
  4. याज्ञवल्क्य जो एक प्रमुख वेदांती दार्शनिक थे , बृहदारण्यक उपनिषद ( बृहदारण्यक उपनिषद ( ४ ) ४ २ ) में इस दर्शन के मूल स्वर को एक मरणासन्न व्यक्ति के स्पृहणीय वर्णन द्वारा प्रस्तुत करते हैं , क्योंकि उनका मत था कि वह मरता हुआ व्यक्ति शरीर के बंधन से उत्तरोतर छुटकारा प्राप्त करता जा रहा है।
  5. याज्ञवल्क्य जो एक प्रमुख वेदांती दार्शनिक थे , बृहदारण्यक उपनिषद ( बृहदारण्यक उपनिषद ( ४ ) ४ २ ) में इस दर्शन के मूल स्वर को एक मरणासन्न व्यक्ति के स्पृहणीय वर्णन द्वारा प्रस्तुत करते हैं , क्योंकि उनका मत था कि वह मरता हुआ व्यक्ति शरीर के बंधन से उत्तरोतर छुटकारा प्राप्त करता जा रहा है।
  6. याज्ञवल्क्य जो एक प्रमुख वेदांती दार्शनिक थे , बृहदारण्यक उपनिषद ( बृहदारण्यक उपनिषद ( ४ ) ४ २ ) में इस दर्शन के मूल स्वर को एक मरणासन्न व्यक्ति के स्पृहणीय वर्णन द्वारा प्रस्तुत करते हैं , क्योंकि उनका मत था कि वह मरता हुआ व्यक्ति शरीर के बंधन से उत्तरोतर छुटकारा प्राप्त करता जा रहा है।
  7. स्मृति काल वैदिक एवं उपनिषदिक काल से काफी बाद का है , लेकिन बृहदारण्यक उपनिषद में हम मेत्रैयी और याज्ञवल्यक्य की कथा पढ़ते हैं जहाँ याज्ञावल्क्य पत्नियों को छोड़ कर सन्यास हेतु वन जाने की बात कहते हैं तो मेत्रैयी यही सवाल करती है कि आपको तो आत्मज्ञान सन्यास से होगा तो आपके छोड़े गये धन से हमारी मुक्ति कैसे सम्भव होगी।
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