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नज़ाक़त meaning in Hindi

pronunciation: [ nejaket ]
नज़ाक़त meaning in English

Examples

  1. और जिस तरह का सेलिब्रेशन इस दरमियाँ बयां होता है वो तो कतई हमारा अपना नहीं है . ..भारतीय प्रेम में नज़ाक़त, नफासत और प्रबल सरसता की त्रिवेणी का वास है...जो नितांत व्यक्तिगत मधुर अनुभूति है..जिसमे प्रदर्शन की कोई गुंजाइश नहीं है।
  2. अमृता प्रीतम और साहिर की प्रेम कहानी के कई अफ़साने आप सभी ने सुने होंगे | ये अफसाना जुदा न सही , पर तफसील और सदाक़त से भरपूर है | रिश्ते की नज़ाक़त और बे-साख्तःगी का बहुत ध्यान रखने की पूरी कोशिश करूंगा |
  3. वक़्त की नज़ाक़त और उसकी मुस्कान को देखकर उसने चुप रहना ही मुनासिब समझा . .........कई बार ख़ामोशी एक ऐसी जरुरत बन जाती है जिसके सामने कोई शब्द मायने नहीं रखते........ये ऐसा ही समय था........वक़्त के ऊपर सब कुछ छोड़ते हुए वो भी मुस्कुराता हुआ आगे बढ़ा.......
  4. खैर , ,, समझा जा सकता है,, हालात को,,, मजबूरियों को,,, वक़्त की नज़ाक़त को बस यहीं से सलाम कुबूल कीजिये हमेशा खुश रहिये,,,,सुखी रहिये,,,, और यूं ही अपना पाकीज़ा फ़र्ज़ निभाते रहिये . उसे आना है,दिल में,जेहन में,पुर-आब आँखों में भला कब'याद'रुक पाती है दुनिया की मनाही से
  5. आप नारी स्वतन्त्रता की आवाज़ बुलन्द करती रहिये , रास्तों को झंडों और बैनर्स से पाट दीजिये, हम तो उसे अदा और नज़ाक़त का ही नाम देंगे, मजबूरी जो ठहरी ! लेकिन इतना ज़रूर याद रखियेगा अनीता जी, कि - 'हद के अन्दर हो नज़ाक़त तो अदा होती है …
  6. आप नारी स्वतन्त्रता की आवाज़ बुलन्द करती रहिये , रास्तों को झंडों और बैनर्स से पाट दीजिये, हम तो उसे अदा और नज़ाक़त का ही नाम देंगे, मजबूरी जो ठहरी ! लेकिन इतना ज़रूर याद रखियेगा अनीता जी, कि - 'हद के अन्दर हो नज़ाक़त तो अदा होती है …
  7. आप नारी स्वतन्त्रता की आवाज़ बुलन्द करती रहिये , रास्तों को झंडों और बैनर्स से पाट दीजिये , हम तो उसे अदा और नज़ाक़त का ही नाम देंगे , मजबूरी जो ठहरी ! लेकिन इतना ज़रूर याद रखियेगा अनीता जी , कि - ‘ हद के अन्दर हो नज़ाक़त तो अदा होती है …
  8. आप नारी स्वतन्त्रता की आवाज़ बुलन्द करती रहिये , रास्तों को झंडों और बैनर्स से पाट दीजिये , हम तो उसे अदा और नज़ाक़त का ही नाम देंगे , मजबूरी जो ठहरी ! लेकिन इतना ज़रूर याद रखियेगा अनीता जी , कि - ‘ हद के अन्दर हो नज़ाक़त तो अदा होती है …
  9. यूं तो रोज़ हम तुम्हारी खिड़की को ताका करते थे उस हसीं चेहरे की आस में घंटों हम गुज़ारा करते थे वो सिलसिला तब ख़त्म हुआ जिसे सोचते थे हमदम जब हमारा ना हुआ कुछ वक़्त की नज़ाक़त है कुछ बाधाओं का ख़याल क्यों आज ना साथ हैं हम ना करना फिर यह सवाल . .....
  10. जावेद अख़्तर को पढ़ना या सुनना शब्दों के उस बेजोड़ हुनर से रूबरू होना है जो वक़्त की नज़ाक़त को पढ़ना जानता है , वह अवाम की तहज़ीब , ज़ुबान , पहनावे और खानपान से बाख़बर होकर ऐसी पटकथा रचता है जो कालजयी हो जाती है और संवादों की ताक़त से शोले को एक कल्ट मूवी बना देती है .
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