जाँत meaning in Hindi
pronunciation: [ jaanet ]
Examples
- एक लाईनायशस्वी ब्लॉगर भवः ! ! :पैरोडी लेखनम कुरु उन्माद सुख .... :टुन्नावस्था की सहज उपलब्धि ऎ बहुरिया साँस लऽ, ढेंका छोड़ि दऽ जाँत लऽ : उनका फ़िरि-फ़िरि टिपियान दे!गबन की राशि लौटाने को कोषाध्यक्ष के नाम खुला पत्र : अधरस्ते से गायबछठा वेतनमान, सेल्स वालों...
- एक लाईनायशस्वी ब्लॉगर भवः ! ! :पैरोडी लेखनम कुरु उन्माद सुख .... :टुन्नावस्था की सहज उपलब्धि ऎ बहुरिया साँस लऽ, ढेंका छोड़ि दऽ जाँत लऽ : उनका फ़िरि-फ़िरि टिपियान दे!गबन की राशि लौटाने को कोषाध्यक्ष के नाम खुला पत्र : अधरस्ते से गायबछठा वेतनमान, सेल्स वालों
- जनमानस द्वारा परिश्रम के समय जिन गीतों का सहारा लेकर अपने श्रम का परिहार करते है , वे श्रम गीत कहलाते है | कृषि आधारित समाज में खेतों को बोते, काटते, निराने या स्त्रियों द्वारा जाँत चलाते, अनाज पीसते और कुटने समय इन गीतों को गया जाता है |
- दोबारा सोचता हूँ तो लगता है कि कुछ सम्बन्ध आर्द्रा में यव या जौ ( अर्थात इस फसल की ) बुआई से हो शायद , और हस्त में जाँत ( चक्की , या थोड़ा अर्थ को दूर तक ले जाएँ तो शायद खेती की निराई ) से अर्थ सम्बन्धित हो सकता है।
- घुमक्कड़ मिजाजी बिजूके को ज्यों खडा कर दिया है , रिसर्च के पन्नों और दलीलों में | जीवन को रंगमंच,सिनेमा और घुमक्कड़ी के पायों पर खडा पाता हूँ | चौथा पाया किताबें हैं,जो एक मुकम्मल जीवन की इमारत खड़ी करती हैं | इस चौथे पाए की नींव जाँत रहा हूँ,इसलिए दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग से 'भिखारी ठाकुर के नाटकों का
- घुमक्कड़ मिजाजी बिजूके को ज्यों खडा कर दिया है , रिसर्च के पन्नों और दलीलों में | जीवन को रंगमंच,सिनेमा और घुमक्कड़ी के पायों पर खडा पाता हूँ | चौथा पाया किताबें हैं,जो एक जीवन की मुकम्मल इमारत खड़ी करती हैं | इस चौथे पाए की नींव जाँत रहा हूँ,इसलिए दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग से 'भिखारी ठाकुर के नाटकों का
- आलोचना की कसी जाँत में , श्रीकांत के शब्दों को कई बार दर कर , निकली बूसी को फटकारकर और निकले अर्थ में घोलकर , फिर विवेक के सूप से पछोरकर , संवेदना के ताप से सुखाकर , विचार की अँगुलियों से बीनकर , और अंत में आत्म की भाषा की चासनी में डुबोकर जोर से फूँक दिया गया ..........
- घुमक्कड़ मिजाजी बिजूके को ज्यों खडा कर दिया है , रिसर्च के पन्नों और दलीलों में | जीवन को रंगमंच , सिनेमा और घुमक्कड़ी के पायों पर खडा पाता हूँ | चौथा पाया किताबें हैं , जो एक जीवन की मुकम्मल इमारत खड़ी करती हैं | इस चौथे पाए की नींव जाँत रहा हूँ , इसलिए दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग से ' भिखारी ठाकुर के नाटकों का संस्कृतिमूलक अध्ययन ' विषय पर शोधरत हूँ और फिलहाल दिल्ली विश्वविद्यालय के सत्यवती कॉलेज के हिंदी विभाग में बतौर सहायक प्रोफ़ेसर अध्यापन कर रहा हूँ |