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साअत meaning in Hindi

pronunciation: [ saaat ]
साअत meaning in English

Examples

  1. हिज्र कि लम्बी रात का खौफ निकल जायेआँखों पर फिर नींद का जादू चल जायेबड़ी भयानक साअत आने वाली हैआओ जातां कर देखे शायद टल जाये मै फिर कागज कि किश्ती पर आता हुदरिया से कहला दो ज़रा संभल जायेया मै सोचु कुछ भी न उसके बारे मेंया ऐसा हो दुनिया और बदल जायेजितनी प्यास है उससे ज्यादा पानी होमुमकिन है ऐ काश ये खतरा टल जाये - शहरयारमायनेसाअत=घडी
  2. नौफ़ ! देखो दाऊद ( अ 0 ) रात के वक़्त ऐसे ही मौक़े पर क़याम किया करते थे और फ़रमाते थे के यह वह साअत है जिसमें जो बन्दा भी दुआ करता है परवरदिगार उसकी दुआ को क़ुबूल कर लेता है , मगर यह के सरकारी टैक्स वसूल करने वाला , लोगों की बुराई करने वाला , ज़ालिम हुकूमत की पोलिस वाला या सारंगी और ढोल ताशे वाला हो।
  3. क्या तुम्हारा ख़याल यह है के तुम्हें वह साअत मालूम है जिसमें निकलने वाले से बलाएं टल जाएंगी और तुम उस साअत से डराना चाहते हो जिसमें सफ़र करने वाला नुक़सानात में घिर जाएगा ? याद रखो जो तुम्हारे इस बयान की तस्दीक़ करेगा वह क़ुरान की तकज़ीब करने वाला होगा और महबूब अष्याअ के हुसूल और नापसन्दीदा उमूर के दफ़ा करने में मददे ख़ुदा से बे नियाज़ हो जाएगा।
  4. क्या तुम्हारा ख़याल यह है के तुम्हें वह साअत मालूम है जिसमें निकलने वाले से बलाएं टल जाएंगी और तुम उस साअत से डराना चाहते हो जिसमें सफ़र करने वाला नुक़सानात में घिर जाएगा ? याद रखो जो तुम्हारे इस बयान की तस्दीक़ करेगा वह क़ुरान की तकज़ीब करने वाला होगा और महबूब अष्याअ के हुसूल और नापसन्दीदा उमूर के दफ़ा करने में मददे ख़ुदा से बे नियाज़ हो जाएगा।
  5. इस गुलिस्ताने-जहां में क्या गुले-इश्रत नहीं सैर के क़ाबिल है ये पर सैर की फ़ुरसत नहीं कहते हैं मर जाएं , गर छुट जाएं ग़म के हाथ से पर तिरे ग़म से हमें मरने की भी फ़ुरसत नहीं दिल वो क्या जिसको नहीं तेरी तमन्ना-ए-विसाल चश्म वो क्या जिसको तेरी दीद की हसरत नहीं खाक होकर भी फ़लक के हाथ से हमको क़रार एक साअत मिस्ले-रेगे-शीशा-ए-साअत नहीं जौक़' इस सुरत-कदे में हैं हजारों सूरतें कोई सूरत अपने सूरत-गर की बे-सूरत नहीं
  6. वह इस मुअमिले में चलने वाले हैवानों ( पशुओं ) और सख़्त पत्थरों के मानिन्द ( समान ) हैं अहले बसीरत ( देखने वालों ) के लिये छिपी हुई चीज़ें ज़ाहिर ( प्रकट ) हो गई हैं और भटकने वालों के लिये हक़ की राह वाज़ेह ( स्पष्ट ) हो गई , और आने वाली साअत ने अपने चेहरे से नक़ाब उलट दी और ग़ोर से देखने वालों के लिये अलामतें ( लक्षण ) ज़ाहिर ( प्रकट ) हो चुकी हैं।
  7. इस गुलिस्ताने-जहां में क्या गुले-इश्रत नहीं सैर के क़ाबिल है ये पर सैर की फ़ुरसत नहीं कहते हैं मर जाएं , गर छुट जाएं ग़म के हाथ से पर तिरे ग़म से हमें मरने की भी फ़ुरसत नहीं दिल वो क्या जिसको नहीं तेरी तमन्ना-ए-विसाल चश्म वो क्या जिसको तेरी दीद की हसरत नहीं खाक होकर भी फ़लक के हाथ से हमको क़रार एक साअत मिस्ले-रेगे-शीशा-ए-साअत नहीं जौक़ ' इस सुरत-कदे में हैं हजारों सूरतें कोई सूरत अपने सूरत-गर की बे-सूरत नहीं
  8. उन्होंने बदन की सलामती के वक़्त कोई तैयारी नहीं की थी और इब्तेदाई औक़ात में कोई इबरत हासिल नहीं की थी , तो क्या जवानी की तरो ताज़ा उम्रे रखने वाले बुढ़ापे में कमर झुक जाने का इन्तेज़ार कर रहे हैं और क्या सेहत की ताज़गी रखने वाले मुसीबतों और बीमारियों के हवादिस का इन्तेज़ार कर रहे हैं और क्या बक़ा की मुद्दत रखने वाले फ़ना के वक़्त के मन्ज़र हैं जब के वक़्ते ज़वाल क़रीब होगा और इन्तेक़ाल की साअत नज़दीकतर होगी।
  9. ख़ुदा वह साअत न लाए के तू मुझे धोका दे सके , जा मेरे अलावा किसी और को धोका दे, मुझे तेरी ज़रूरत नहीं है, मैं तुझे तीन मरतबा तलाक़ दे चुका हूँ जिसके बाद रूजूअ का कोई इमकान नहीं है, तेरी ज़िन्दगी बहुत थोड़ी है और तेरी हैसियत बहुत मामूली है और तेरी उम्मीद बहुत हक़ीर 'ौ है” आह ज़ादे सफ़र किस क़द्र कम है , रास्ता किस क़द्र तूलानी है, मन्ज़िल किस क़द्र दूर है और वारिद होने की जगह किस क़द्र ख़तरनाक है।
  10. यहाँ मैं जालिब साहब की कुछ गजलें दे रहा हूँ , जो मुझे. बहुत पसंद आईं.......गली में ना आएं हमये और बात तेरी गली में ना आएं हमलेकिन ये क्या कि शहर तेरा छोड़ जाएँ हममुद्दत हुई है कू-ए-बुताँ की तरफ गएआवारगी से दिल को कहाँ तक बचाएंहम शायद बाक़ैद-ए-ज़ीस्त ये साअत ना आ सकेतुम दास्ताँ-ए-शौक़ सुनो और सुनाएं हमबेनूर हो चुकी है बहुत शहर की फजातारीक रास्तों में कहीँ खो ना जाएँ हमउस के बग़ैर आज बहुत जी उदास है'जालिब' चलो कहीं से उसे ढूँढ लाएं हमइस शहर-ए-खराबी में ......
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