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राज्ञी meaning in Hindi

pronunciation: [ raajenyi ]
राज्ञी meaning in English

Examples

  1. दिलचस्प यह कि भारत में जहां राज्ञी जैसे प्रभावी शब्द को अपनाने की चाह में जनसामान्य ने इसका रानी रूप अपना लिया जो एक सामान्य नाम की तरह प्रयोग होता है।
  2. दिलचस्प यह कि भारत में जहां राज्ञी जैसे प्रभावी शब्द को अपनाने की चाह में जनसामान्य ने इसका रानी रूप अपना लिया जो एक सामान्य नाम की तरह प्रयोग होता है।
  3. ङीप् प्रत्यय में ई का स्वर होता है जिसके लगने ले ज + न की ध्वनियां ज्ञ में बदल गई और बन गया राज्ञी शब्द जिसका अर्थ हुआ राजा की पत्नी , राजरानी।
  4. विविध क्षेत्रों में गणगौर के अपने रंग हैं , जिसके मूल में सूर्य और राज्ञी, शिव-पार्वती, ब्रह्मा-सावित्री और चन्द्र-रोहिणी के पूजन का विधान है, लेकिन सबसे अधिक पूजा जाता है रनुदेवी (प्राज्ञी) व उनके पति घणियर राजा (सूर्यदेव) को, जिसे राजस्थान में गौरा/ गवर/गऊर/गौरज्या/गौर/ गिरगौर/गवरत्न/गौरत्न/गवरजा/ गैवरोबाई/गवरादे/गवरी आदि नामों से भी पुकारा जाता है।
  5. साम्राज्ञी विभ्राट , कभी जाते इसको देखा है समारोह-प्रांगण में पहने हुए दुकूल तिमिर का नक्षत्रॉ से खचित, कूल-कीलित झालरें विभा की गूँथे हुए चिकुर में सुरभित दाम श्वेत फूलॉ के? और सुना है वह अस्फुट मर्मर कौशेय वसन का जो उठता मणिमय अलिन्द या नभ के प्राचीरॉ पर मुक्ता-भर,लम्बित दुकूल के मन्द-मन्द घर्षण से, राज्ञी जब गर्वित गति से ज्योतिर्विहार करती है?
  6. इस निष्कासन पर उसका सारा व्यक्तित्व चीत्कार कर रहा था , किन्तु उसके मुँह से एक शब्द नहीं निकला और उसके विवेक ने किसी विचार का स्पष्ट निश्चय किया तो यही कि एक नहीं , पचास शेखर भी जितनी श्रद्धा , जितनी आस्था , जितना प्यार इस राज्ञी को दे सकते हैं , वह सब उस एक क्षण के सामने हेय और नगण्य है।
  7. साम्राज्ञी विभ्राट , कभी जाते इसको देखा है समारोह-प्रांगण में पहने हुए दुकूल तिमिर का नक्षत्रॉ से खचित , कूल-कीलित झालरें विभा की गूँथे हुए चिकुर में सुरभित दाम श्वेत फूलॉ के ? और सुना है वह अस्फुट मर्मर कौशेय वसन का जो उठता मणिमय अलिन्द या नभ के प्राचीरॉ पर मुक्ता-भर , लम्बित दुकूल के मन्द-मन्द घर्षण से , राज्ञी जब गर्वित गति से ज्योतिर्विहार करती है ?
  8. साम्राज्ञी विभ्राट , कभी जाते इसको देखा है समारोह-प्रांगण में पहने हुए दुकूल तिमिर का नक्षत्रॉ से खचित , कूल-कीलित झालरें विभा की गूँथे हुए चिकुर में सुरभित दाम श्वेत फूलॉ के ? और सुना है वह अस्फुट मर्मर कौशेय वसन का जो उठता मणिमय अलिन्द या नभ के प्राचीरॉ पर मुक्ता-भर , लम्बित दुकूल के मन्द-मन्द घर्षण से , राज्ञी जब गर्वित गति से ज्योतिर्विहार करती है ?
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