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पाँख meaning in Hindi

pronunciation: [ paanekh ]
पाँख meaning in English

Examples

  1. देखो , श्री रामजी की कृपा से ( देखते ही देखते ) मेरा शरीर कैसा हो गया ( बिना पाँख का बेहाल था , पाँख उगने से सुंदर हो गया ) ! ॥ 1 ॥
  2. देखो , श्री रामजी की कृपा से ( देखते ही देखते ) मेरा शरीर कैसा हो गया ( बिना पाँख का बेहाल था , पाँख उगने से सुंदर हो गया ) ! ॥ 1 ॥
  3. स्निग्ध स्नाता चाँदनी थी मन विहग था पाँख खोले तरंगायित रागिनी के मदिर स्वर थे सुमन फूले उल्लास का पर्वत हरा था बरसते थे मेह झरझर भोर का तारा उगा था हर्ष का मनुहार बनकर ।
  4. तोड़कर जब से गए थे वे सुनहरी पाँख फिर कभी बोली न माँ की डबडबाई आँख लख न पाया जिन्हें नन्हा प्यार वे हमारे ही पिता तो थे लाख वे रौंदे गए फिर भी जले प्रतिपल तन बिका था।
  5. सूतंह सूत बेधा अस गाढ़े बरुनि बान अस ओपहँ , बेधो रन बन ढाँख सौजहिं तन सब रोवाँ , पंखिहि तन सब पाँख इसी प्रकार योगी रतनसेन के कठिन मार्ग के वर्णन में साधक के मार्ग के विघ्नों ( काम , क्रोध आदि विकारों ) की व्यंजना की है ओहि मिलान जौ पहुँचे कोई ।
  6. गीत अपनी शुरुआत के इस पहले हिस्से से ही पकड़ बना लेता है , खासकर लताजी जब ऊँचे सुरों से शुरुआत करके “तू चन्दा मैं चाँदनी” के बाद बेहद धीमे सुरों में “तू बादल मैं बिजुरी” गाती हैं और फ़िर पुनः ऊँचे सुर में “तू पंछी मैं पाँख रे” की तान छेडकर हमें हिंडोले का मजा देती हैं...
  7. गीत अपनी शुरुआत के इस पहले हिस्से से ही पकड़ बना लेता है , खासकर लताजी जब ऊँचे सुरों से शुरुआत करके “ तू चन्दा मैं चाँदनी ” के बाद बेहद धीमे सुरों में “ तू बादल मैं बिजुरी ” गाती हैं और फ़िर पुनः ऊँचे सुर में “ तू पंछी मैं पाँख रे ” की तान छेडकर हमें हिंडोले का मजा देती हैं ...
  8. कब मक्का सी पीली धूप , हरी अँबियोँ से खेलेगी? कब नीले जल मेँ तैरती मछलियाँ, अपना पथ भूलेँगीँ ? क्या पानी मेँ भी पथ बनते होँगेँ ? होते होँगे, बँदनवार ? क्या कोयल भी उडती होगी, निश्चिन्त, गगन पथ निहार ? मानव भी छोड धरातल, उपर उठना चाहता है - तब ना होँगे नक्शे कोई, ना होँगे कोई और नियम ! कवि की कल्पना के पाँख उडु उडु की रट करते हैँ!
  9. मुकेश पाण्डे ज्वलंत समस्या पर अपनी लेखनी चला रहे हैं -अजन्मी की पुकार सुना है माँ तुम मुझे , जीने के पहले ही मार रही हो कसूर क्या मेरा लड़की होना , इसलिए नकार रही हो सच कहती हूँ माँ , आने दो मुझे जीवन में एक बार न मांगूंगी खेल-खिलौने , न मांगूंगी तुमसे प्यार जय कृष्ण राय तुषार जी का एक गीत -एक पत्ता हरा जाने किस तरह है पेड़ पर चोंच में दाना नहीं है पाँख चिड़िया नोचती है |
  10. आ मीत ! चल साथ उडें , आ हाथ मिला बिन पाँख उडें आ चल ऐसी उडान उडें , जिसकी ना कोई विमा हो,जिसकी ना कोई सीमा हो , क्यों समझे हम छोटा ख़ुद को ,क्यों कहें ना हम खुदा ख़ुद को , जब वह बैठा सबके अन्दर है ,तब फ़िर क्या यह सात समंदर है , आ भर ऊर्जा ! क्षितिज को पार करें आ हम उन्मुक्त गगन में नाद करें - “ आ मीत ! चल साथ उडें , आ हाथ मिला बिन पाँख उडें ”
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