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धूआँ meaning in Hindi

pronunciation: [ dhuaan ]
धूआँ meaning in English

Examples

  1. वही गीली लकडियाँ उसी शहतूत की , धूआँ दे रही हैं,शायद, और ये वजह है,मेरे आँसुओं की और मैं फ़िर सोचता हूँ, एक दम तन्हा, क्यों रोईं थीं तुम उस दिन...........! सचमुच कुछ यादें कैसे आँखें भिगो जाती है ।
  2. वही गीली लकडियाँ उसी शहतूत की , धूआँ दे रही हैं,शायद, और ये वजह है,मेरे आँसुओं की और मैं फ़िर सोचता हूँ, एक दम तन्हा, क्यों रोईं थीं तुम उस दिन...........! सचमुच कुछ यादें कैसे आँखें भिगो जाती है ।
  3. चवन्नी में सिटी बस पूरे नउवाबी शहर का सैर करती थी , और एक कप चाय तीन पत्ती पान की गिलौरी मुँह में डाले रॉथमैन्स / ट्रिपलफाइव ( 555 स्टेट एक्सप्रेस ) होंठों से लगाए धूआँ उड़ाने के बाद कुल एक रूपए का ही खर्च बैठता था।
  4. नहीं कुछ और हो जाऊँ उलझन उलझन तैर रहा हूँ जाने क्या से क्या हो जाऊँ कभी सोचता धूप बनूँ . .. जब हम जवां थे .....तब रोमांस में भी रोमांच था..... !!! यादें.....!!! “यू उठा तेरी यादो का धूआँ जैसे चिराग बुझा हो अभी अभी”॥ क्यों याद आता है ,वो गुज़रा ज़माना जो नामुमकिन है,लौट के वापस आना | वो ठंडी ...
  5. पति के साथ कंधा मिलाना तो दूर दिन के उजाले में रूबरू बात करना तक नसीब नहीं होता था , धूआँ , चूल्हा-चौका ही उनकी जिंदगी थी , बच्चों की तरफ से उन्हें कोई उपाधि नहीं दी जाती थी , श्रृंगार के नाम पर नई साड़ी और मेहँदी ही काफी थी , उनके जीवन का एक ही ध्येय था अपने घर को संजो के रखना ................
  6. पति के साथ कंधा मिलाना तो दूर दिन के उजाले में रूबरू बात करना तक नसीब नहीं होता था , धूआँ , चूल्हा-चौका ही उनकी जिंदगी थी , बच्चों की तरफ से उन्हें कोई उपाधि नहीं दी जाती थी , श्रृंगार के नाम पर नई साड़ी और मेहँदी ही काफी थी , उनके जीवन का एक ही ध्येय था अपने घर को संजो के रखना ................
  7. हमने रोहतांग दर्रे और उससे पहले पड़ने वाली पहाड़ियों में कई जगह देखा की बर्फ का रंग आंशिक रूप काला पड़ गया था , और कारण था रोहतांग में डीजल गाड़ियों कि अधिक मात्रा में आवागमन से उनसे निकला काला धूआँ जो इन सफ़ेद बर्फ जमा होकर बर्फ के रंग काला कर देता हैं और दूसरा कारण पर्यटको के द्वारा अपने साथ लाए सामान की गन्दगी और कूड़ा का यहाँ पर छोड़ देना था ।
  8. जब कि मालूम था , कुछ नहीं बदलने वाला, आज जब,ज़िन्दगी की शाम हैं, जनवरी की तेरह, मैने जला लिये हैं, यादों के अलाव, इस उम्मीद में कि तपिश यादों की ही सही, दे सके शायद कुछ सुकूँ, वही गीली लकडियाँ उसी शहतूत की, धूआँ दे रही हैं,शायद, और ये वजह है,मेरे आँसुओं की और मैं फ़िर सोचता हूँ, एक दम तन्हा, क्यों रोईं थीं तुम उस दिन...........! छब्बीस थी शायद, वो जुलाई की! बता तो सही कौन है तू? घुमड रहा है,
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