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द्यु meaning in Hindi

pronunciation: [ deyu ]
द्यु meaning in English

Examples

  1. * भू लोक , अंतरिक्ष लोक और द्यु लोक तीन लोकों में सारा ब्रह्माण्ड है जो सीमा रहित सनातन , गतिमान और मायामय तीन गुणों की उर्जा से परिपूर्ण है ।
  2. फिर ब्राह्मण की सम्पत्ति के बारे में बताते हैं , “ ब्राह्मण की सम्पदा निकटवत्र्ती गुफा ( गुहा-अनुभूति ) में रहती है और द्यु लोक के आधार से परे होती है।
  3. “सौर मण्डल की छोटी वस्तुओं” का अंग्रेज़ी में औपचारिक नाम “स्मॉल सोलर सिस्टम बॉडीज़” ( small solar system bodies) और फ़्रांसिसी में “प्ती कोर द्यु सिस्तैम सोलेर” (petit corps du système solaire) है।
  4. गार्गी पूछती हैं ऋषिवर जो द्युलोक से ऊपर है और पृथ्वी लोक से नीचे है तथा ‘ द्यु ' और ‘ पृथ्वी ' के मध्य भाग में स्थित है वह किसमें समाया है .
  5. अंत में आठों वसुओं ने वशिष्ठजी की प्रार्थना की तो उन्होंने यह सहूलियत कर दी कि अन्य वसु तो वर्ष का अंत होने पर मेरे शाप से छुटकारा पा जाएँगे , किंतु द्यु को अपनी करनी का फल भोगने के लिए एक जन्म तक मनुष्य-लोक में रहना पड़ेगा।
  6. याज्ञवल्क्य - ' हे गार्गी ! द्युलोक से ऊपर , पृथ्वी से नीचे तथा ' द्यु ' औ पृथ्वी के मध्य भाग में जो स्थित है और जो स्वयं भी ' द्यु ' और ' पृथ्वी ' है और जो भूत , भविष्य और वर्तमान कहलाता है , वह आकाश में ओत-प्रोत है।
  7. याज्ञवल्क्य - ' हे गार्गी ! द्युलोक से ऊपर , पृथ्वी से नीचे तथा ' द्यु ' औ पृथ्वी के मध्य भाग में जो स्थित है और जो स्वयं भी ' द्यु ' और ' पृथ्वी ' है और जो भूत , भविष्य और वर्तमान कहलाता है , वह आकाश में ओत-प्रोत है।
  8. याज्ञवल्क्य - ' हे गार्गी ! द्युलोक से ऊपर , पृथ्वी से नीचे तथा ' द्यु ' औ पृथ्वी के मध्य भाग में जो स्थित है और जो स्वयं भी ' द्यु ' और ' पृथ्वी ' है और जो भूत , भविष्य और वर्तमान कहलाता है , वह आकाश में ओत-प्रोत है।
  9. याज्ञवल्क्य - ' हे गार्गी ! द्युलोक से ऊपर , पृथ्वी से नीचे तथा ' द्यु ' औ पृथ्वी के मध्य भाग में जो स्थित है और जो स्वयं भी ' द्यु ' और ' पृथ्वी ' है और जो भूत , भविष्य और वर्तमान कहलाता है , वह आकाश में ओत-प्रोत है।
  10. इसी प्रकार के अन्य अनेक युग्मों-वायु और अन्तरिक्ष , आदित्य और द्यु , चन्द्रमा और नक्षत्र , दिन और रात्रि , ग्रीष्म और शीत , मेघ और वर्षा , विद्युत् और गर्जना , प्राण और अन्न , वेद और छन्द , यज्ञ तथा दक्षिणा-इत्यादि के माध्यम से सविता और सावित्री का विवेचन किया गया है।
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