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तश्नगी meaning in Hindi

pronunciation: [ teshengai ]
तश्नगी meaning in English

Examples

  1. तल्खाबे-ग़म न पीजिये हो तश्नगी अगर भर-भर के जाम पीजिये पैमाना-ए-ग़ज़ल - . न पूछो ये मुझ से कि क्या कर रहा हूँ ग़ज़ल में तजुर्बा नया कर रहा हूँ
  2. जब वह मेहँदी उनके चरणों में लगेगी तो उसकी कामना पूरी हो जायेगी ।” - लबे ख़ुश्क दर तश्नगी मुर्दगाँ का ज़ियारतकद : हूँ दिल आज़र्दगाँ का हम: नाउमीदी, हम: बदगुमानी मैं दिल हूँ, फ़रेबे वफ़ा ख़ुर्दगाँ का ।
  3. नदी के ख़्वाब दिखायेगा तश्नगी देगा खबर न थी वो हमें ऐसी बेबसी देगा नसीब से मिला है इसे हर रखना कि तीरगी में यही ज़ख्म रौशनी देगा तुम अपने हाथ में पत्थर उठाये फिरते रहो मैं वो शजर हूँ जो बदले में छाँव ही देगा
  4. कब से भटक रही थी बेराह मोड़ों पर तस्कीन की तलाश में ये तश्नगी मेरी , अब तुम तलक पहुँच के ठहरी है दो घडी , तुमसे ही मिले हैं इसे सुकून के कुछ घूँट , तो मेरे होंठ से तुम तक हुआ ये प्यास का सफ़र ..
  5. चलते चलते : - हाज़रीन, आज रात ( दो जनवरी ) बिरला आडिटोरियम मुंबई, में मुशाइरा है .उसी की तैय्यारी करते करते इस ग़ज़ल में दो शेर और हो गये, उन पर भी नज़र डाल लीजिये,कभी कभी कलाम मुकम्मल होने के बाद भी कुछ तश्नगी बाकि रह जाती है ,ये अशआर उसी तश्नगी का नतीजा है...
  6. चलते चलते : - हाज़रीन, आज रात ( दो जनवरी ) बिरला आडिटोरियम मुंबई, में मुशाइरा है .उसी की तैय्यारी करते करते इस ग़ज़ल में दो शेर और हो गये, उन पर भी नज़र डाल लीजिये,कभी कभी कलाम मुकम्मल होने के बाद भी कुछ तश्नगी बाकि रह जाती है ,ये अशआर उसी तश्नगी का नतीजा है...
  7. बही किस दिशा से ये नम हवा , मेरी तश्नगी भी झुलस गई! वो ग़ज़ल जो एक क़लाम थी, जो किसी को मेरा सलाम थी, मेरे दिल के दश्त को छोड़ कर जाने कौन देस में बस गई! वो तेरा ख़ुलूस थी, प्यार थी, तेरी रहमतों की फुहार थी; मेरे प्यासे खेतों को छोड़ कर, जो समंदरों पे बरस गई।
  8. एक बेहतरीन संकलन से रूबरु होने का मौका मिला पाठक इस बात को लेकर किंकर्तव्यविमूढ हो जाता है कि जो शेर पढ रहा है वो बेहतर है या इससे पहले पढा वो बेहतर है या अगला बेहतर है नदी के ख़्वाब दिखायेगा तश्नगी देगा खबर न थी वो हमें ऐसी बेबसी देगा गुरु - गोविन्द की तर्ज पर बेहतरीन संकलन से परिचित कराने के लिए गोस्वामीजी का धन्यवाद .
  9. इक ग़ज़ल उस पे लिखूँ दिल का तकाज़ा है बहुत इन दिनों ख़ुद से बिछड़ जाने का धड़का है बहुत रात हो दिन हो ग़फ़लत हो कि बेदारी हो उसको देखा तो नहीं है उसे सोचा है बहुत तश्नगी के भी मुक़ामात हैं क्या क्या यानी कभी दरिया नहीं काफ़ी , कभी क़तरा है बहुत मेरे हाथों की लकीरों के इज़ाफ़े हैं गवाह मैं ने पत्थर की तरह ख़ुद को तराशा है बहुत
  10. ( (( -हक़ीक़ते अम्र यह है के इन्सान आखि़रत की तरफ़ से बिलकुल ग़फ़लत का मुजस्समा बन गया है के दुनिया में किसी को तकलीफ़ में नहीं देख पाता है और उसकी दादरसी के लिये तैयार हो जाता है और आखि़रत में पेश आने वाले ख़ुद अपने मसाएब की तरफ़ से भी यकसर ग़ाफ़िल है और एक लम्हे के लिये भी आफ़ताबे महशर के साये और गर्मी क़यामत की तश्नगी का इन्तेज़ाम नहीं करता है।
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