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चमरौधा meaning in Hindi

pronunciation: [ chemraudhaa ]
चमरौधा meaning in English

Examples

  1. एक महाशय , जिनके सिर पर पंजाबी ढंग की पगड़ी थी , गाढ़े का कोट और चमरौधा जूता पहने हुए थे , आगे बढ़ आये और नेतृत्व के भाव से बोले-महायाय , इस बैंक के फेलियर ने कितने ही इंस्टीट्यूशनों को समाप्त कर दिया।
  2. ' बिवाई पड़े पांवों में चमरौधा जूता , मैली-सी धोती और मैला ही कुरता , हल की मूठ थाम-थाम कर सख् त और खुरदुरे पड़ चुके हाथ और कंधे पर अंगोछा , यह खाका ठेठ हिन् दुस् तानी का नहीं जनकवि अदम गोंडवी का भी है।
  3. पंडितजी का वेश बदल चुका है-एक मैली फटी धोती , कुर्ता तथा चमरौधा जूता पहने , हाथ में लाठी लिए खेतों की रखवाली कर रहे हैं , घास उखाड़ रहे हैं , छांटी छांट रहे हैं , दंवरी हांक रहे हैं , सिर पर बोझा ढो रहे हैं , फिर आधा पेट खाकर सो जा रहे हैं।
  4. उपन्यासकार ने कई प्रकार के जूतों का वर्णन किया है , जैसे चट्टी चमरौधा , चटपटिया , पंप जूता , बूट , नारी , मलेटरी बाला जूता , कपरहवा जूता , का बयान करेते-करते चाँदी के जूते पर आ जाता है और उसकी महिमा का गुणगान कराते हुये कहता है - ” मगर जो मजा चांदी के जूते में है वह किसी जूते में नहीं।
  5. मुझे पिता के चमरौधे जूते की स्मृति है वे गाँव से ढाई कोस दूर मोचियों के गाँव से लाते थे , चमरौधा जूता उसमें डालते थे सरसों का तेल ताकि मुलायम हो जाए चमरौधे जूते चलने में कोई परेशानी न हो , चमरौधा जूता , पहनने के शुरु में उन्हे काटता था वे बताते थे चमरौधा जूता नहीं मरे जानवर के दाँत हमे काट रहे हैं
  6. मुझे पिता के चमरौधे जूते की स्मृति है वे गाँव से ढाई कोस दूर मोचियों के गाँव से लाते थे , चमरौधा जूता उसमें डालते थे सरसों का तेल ताकि मुलायम हो जाए चमरौधे जूते चलने में कोई परेशानी न हो , चमरौधा जूता , पहनने के शुरु में उन्हे काटता था वे बताते थे चमरौधा जूता नहीं मरे जानवर के दाँत हमे काट रहे हैं
  7. मुझे पिता के चमरौधे जूते की स्मृति है वे गाँव से ढाई कोस दूर मोचियों के गाँव से लाते थे , चमरौधा जूता उसमें डालते थे सरसों का तेल ताकि मुलायम हो जाए चमरौधे जूते चलने में कोई परेशानी न हो , चमरौधा जूता , पहनने के शुरु में उन्हे काटता था वे बताते थे चमरौधा जूता नहीं मरे जानवर के दाँत हमे काट रहे हैं
  8. मुझे पिता के चमरौधे जूते की स्मृति है वे गाँव से ढाई कोस दूर मोचियों के गाँव से लाते थे , चमरौधा जूता उसमें डालते थे सरसों का तेल ताकि मुलायम हो जाए चमरौधे जूते चलने में कोई परेशानी न हो , चमरौधा जूता , पहनने के शुरु में उन्हे काटता था वे बताते थे चमरौधा जूता नहीं मरे जानवर के दाँत हमे काट रहे हैं
  9. मुझे पिता के चमरौधे जूते की स्मृति है वे गाँव से ढाई कोस दूर मोचियों के गाँव से लाते थे , चमरौधा जूता उसमें डालते थे सरसों का तेल ताकि मुलायम हो जाए चमरौधे जूते चलने में कोई परेशानी न हो , चमरौधा जूता , पहनने के शुरु में उन्हे काटता था वे बताते थे चमरौधा जूता नहीं मरे जानवर के दाँत हमे काट रहे हैं
  10. युग युग जियो डाकिया भैया नाम से 1956 में प्रकाशित अनिल मोहन की यह कविता इस संदर्भ में उल्लेखनीय है- युग-युग जियो डाकिया भैया , सांझ सबेरे इहै मनाइत है..हम गंवई के रहवैयापाग लपेटे,छतरी ताने,काँधे पर चमरौधा झोला,लिए हाथ मा कलम दवाती,मेघदूत पर मानस चोलासावन हरे न सूखे काति,एकै धुन से सदा चलैया....शादी,गमी,मनौती,मेला,बारहमासी रेला पेलापूत कमासुत की गठरी के बल पर,फैला जाल अकेलागांव सहर के बीच तुहीं एक डोर,तुंही मरजाद रखवैया
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