प्रश्नचिन्ह लगाना meaning in Hindi
pronunciation: [ pershenchinh legaaanaa ]
Examples
- रहा बीबीसी का ये सवाल पूछना कि क्या अल्पसंख्यकों को आरक्षण देने की वाक़ई ज़रूरत है और उसपर प्रश्नचिन्ह लगाना इस बात को दर्शाता है कि शायद बीबीसी भी चाहती है कि अल्पसंख्यकों को आरक्षण ना मिले .
- बदलाव न आने के लिए आप मेरे प्रयासों को चुनौति दे सकती है , उपदेश , प्रवचन सीख , उत्साह या प्रोत्साहन को चुनौति अवश्य दें लेकिन पाठकों की बुद्धिमत्ता और सकारात्मकता पर प्रश्नचिन्ह लगाना अच्छी बात नहीं है .
- जन्मकुंडली देखकर हम ज्योतिषी जन्मकुंडली पर आधारित प्रश्नों के सांकेतिक ही सही , पर भूत , वर्तमान और भविष्य के हर प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं , कर्मकुंडली पर आधारित प्रश्न पूछकर एक ज्योतिषी की योग्यता या ज्योतिष-शास्त्र पर प्रश्नचिन्ह लगाना उचित नहीं है।
- जन्मकुंडली देखकर हम ज्योतिषी जन्मकुंडली पर आधारित प्रश्नों के सांकेतिक ही सही , पर भूत , वर्तमान और भविष्य के हर प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं , कर्मकुंडली पर आधारित प्रश्न पूछकर एक ज्योतिषी की योग्यता या ज्योतिष-शास्त्र पर प्रश्नचिन्ह लगाना उचित नहीं है।
- वृक्ष की पौराणिकता पर प्रश्नचिन्ह बेमानी : मदन मिश्र वृन्दावन : उद्धव गोपी तीर्थ स्थल विकास समिति के अध्यक्ष मदन मिश्र का कहना है कि ज्ञानगुदड़ी स्थल एवं इसमें स्थापित वृक्षों की पौराणिकता पर किसी भी प्रकार प्रश्नचिन्ह लगाना बेमानी एवं श्रद्धालुओं की भावनाओं के साथ खिलवाड़ होगा।
- मेरे हिसाब एक लेखक की बात पढ़ी जाए , समझी जाए , सहमति और असहमति दर्ज़ कराई जाये अगर पाठक कुछ अलग अर्थ निकाल पा रही / रहा है तो उसे दर्ज़ कराया जाये ; लेकिन लेखक की विद्द्वता पर या उसके लिखे पर प्रश्नचिन्ह लगाना या उसे “ ज्ञान देने ” की चेष्टा करना कहाँ तक उचित है ? अगर आप विषय-विशेष की लेखक से जादा समझ रखते हैं तो उसे सामने लाइये ।
- तसलीमा जी स्त्री का विद्वान होने का होने का मतलब , ये नही होता कि वो कुच्छेक असामाजिक तत्व जो समाज में प्रचलित मर्यादाओं का बेजा फ़ायदा उठाते है उनके कुकर्मो को विस्तार, प्रचार-प्रसार करके प्रचलित मर्यादाओं को एक सिरे से नकारना ही शुरू कर दे| अपराधियों को सजा देने के लिए प्रत्येक देश में क़ानून बने हुए है इसके लिए उन्हें प्रभावी-ढंग से लागू करवाने की कोशिस करनी चाहिए ना कि सामाजिक व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाना चाहिए|
- मेरे हिसाब से अनुराग जी ने बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया जिस पर विचार अत्यंत आवश्यक है , ये सवाल हमें सोचने पर विवश करता है कि क्या वो दिन ही सही थे जब कुछ ही दोस्त थे पर वो वाकई में, और सच्चे अर्थों में अपने थे, मैं ये कहकर अपने दोस्तों का दिल दुखाना नहीं चाहता और न ही किसी की विश्वशनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगाना चाहता हूँ, पर उनके इस जबाब ने मुझे सोचने पर विवश किया, स्वनिरीक्षण और अन्तरविश्लेषण करना ही होगा कि क्या हम वाकई में अपने हर दोस्त का ख़याल रख पाते हैं ?