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पौरुषहीन meaning in Hindi

pronunciation: [ paurushin ]
पौरुषहीन meaning in English

Examples

  1. इसके विपरीत बल पौरुषहीन व्यक्ति के लिए स्वप्न सुन्दरी जैसी रूपवती स्त्री भी किसी काम की नहीं।
  2. उनका विचार है कि पुनर्जन्म का सिद्धांत समाज में नियतिवाद को जन्म देता है , जो मनुष्य को निष्क्रिय तथा पौरुषहीन बना देता है।
  3. उत्तरकाल के संस्कृत नाटकों में इसी प्रकार के पौरुषहीन , नि : सार और विलासमय प्रेम का प्राय : वर्णन हुआ है , जैसे रत्नावली , प्रियदर्शिका , कर्पूरमंजरी इत्यादि में।
  4. क्योंकि समलैंगिकता एक तथाकथित बौद्धिक , अति- आधुनिक , समृद्ध , व्यवस्थित या वास्तव में एक पौरुषहीन , सुस्त समाज की सबसे बड़ी बीमारी है जो बीमारी लगती नहीं है ( अल्प बुद्धियो को ) .
  5. इस्लाम के संस्थापक पैगम्बर हजरत मुहम्मद बहुत ही कुरुप , अभद्र,हवसी,विलासी व्यक्ति थे,जो हमेशा औरतोँ के साथ व्यभिचार करने को उन्मुक्त रहते थे लेकिन उनके अति स्थूल बेजान पौरुषहीन आकर्षण विहीन शरीर तथा अतिकुरुप चेहरे के कारण हर औरत उनसे घृणा करती थी।
  6. आप और हम जब अपने-अपने ऑफिसों में महिंद्रा के बंधु-बांधवों की कंपनियों में खट रहे होंगे तो लगभग पौरुषहीन हो चुका महिंद्रा किसी कोमलांगी की बाहों में झूल रहा होगा और उसका पोता किसी जेसिका लाल जैसियों की हत्या कर रहा होगा।
  7. आप और हम जब अपने-अपने ऑफिसों में महिंद्रा के बंधु-बांधवों की कंपनियों में खट रहे होंगे तो लगभग पौरुषहीन हो चुका महिंद्रा किसी कोमलांगी की बाहों में झूल रहा होगा और उसका पोता किसी जेसिका लाल जैसियों की हत्या कर रहा होगा।
  8. पूंजी , बुद्धि एवं यन्त्रों के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों के सीमित भंण्डारों का अन्धाधुन्ध दोहन और तद्जन्य धन सम्पत्ति पर एकाधिकार जहाँ मनुष्य,समाज और देशों के मध्य कलह और युद्धों का कारण बनता है वहीं दूसरी ओर स्वयं और सन्ततियों को काहिल और पौरुषहीन भी बना देता है।
  9. पूंजी , बुद्धि एवं यन्त्रों के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों के सीमित भंण्डारों का अन्धाधुन्ध दोहन और तद्जन्य धन सम्पत्ति पर एकाधिकार जहाँ मनुष्य,समाज और देशों के मध्य कलह और युद्धों का कारण बनता है वहीं दूसरी ओर स्वयं और सन्ततियों को काहिल और पौरुषहीन भी बना देता है।
  10. पूंजी , बुद्धि एवं यन्त्रों के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों के सीमित भंण्डारों का अन्धाधुन्ध दोहन और तद्जन्य धन सम्पत्ति पर एकाधिकार जहाँ मनुष्य , समाज और देशों के मध्य कलह और युद्धों का कारण बनता है वहीं दूसरी ओर स्वयं और सन्ततियों को काहिल और पौरुषहीन भी बना देता है।
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