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दुवारी meaning in Hindi

pronunciation: [ duvaari ]
दुवारी meaning in English

Examples

  1. और अंततः एक लोकगीत की तर्ज पर पिता को आश्वस्त करती है- ‘ टुटही मडईया मा जिनगी बितऊबै , नाही जइबे आन की दुवारी जी . '
  2. अरे तुहरे बाप का राज है , पहले हमारे डंडा के डर से सिटी केबल वाला चार पांच महीना में डरावत , सपटत दीन हीन बनकर हमारे दुवारी में आता था और ‘ जो देना हो दे दो सर ' बोलता था ।
  3. प्रो . बिलियम डी . ब्लेयर , वूल्सले , चिल्टनबरा , टर्नर केटलिज , जे . जे . सिंडलर , हार्पर लीच से मैन्सफिल्ड तक की सिद्धान्तों को लेकर अनेको तिवारी दुवारी की परिभाषाओं को अधार बनाकर एक पत्रकार ने आखिर सत्तासीन सरकार की चूले हिलाने की खातिर रेडिमेड खबर को भगवान का तड़का लगाकर छपवा ही दिया।
  4. घर के दुवारी ले दाई रोवथे आज नोनी होये बिराने ओ घर के दुवारी ले ददा मोर रोवथे रांध के देवइया बेटी जाथे अपन कुरिया के दुवारी ले भईया मोर रोवथे मन के बोधइया बहिनी जाथे भीतरी के दुवारी भउजी मोर रोवथे लिगरी लगइया नोनी जाथे दाई मोर रोवथे नदिया बहथे ददा रोवय छाती फाटथ हे हाय हाय मोर दाई भईया रोवय समझाथे भउजी नयन कठोरे वो
  5. घर के दुवारी ले दाई रोवथे आज नोनी होये बिराने ओ घर के दुवारी ले ददा मोर रोवथे रांध के देवइया बेटी जाथे अपन कुरिया के दुवारी ले भईया मोर रोवथे मन के बोधइया बहिनी जाथे भीतरी के दुवारी भउजी मोर रोवथे लिगरी लगइया नोनी जाथे दाई मोर रोवथे नदिया बहथे ददा रोवय छाती फाटथ हे हाय हाय मोर दाई भईया रोवय समझाथे भउजी नयन कठोरे वो
  6. घर के दुवारी ले दाई रोवथे आज नोनी होये बिराने ओ घर के दुवारी ले ददा मोर रोवथे रांध के देवइया बेटी जाथे अपन कुरिया के दुवारी ले भईया मोर रोवथे मन के बोधइया बहिनी जाथे भीतरी के दुवारी भउजी मोर रोवथे लिगरी लगइया नोनी जाथे दाई मोर रोवथे नदिया बहथे ददा रोवय छाती फाटथ हे हाय हाय मोर दाई भईया रोवय समझाथे भउजी नयन कठोरे वो
  7. घर के दुवारी ले दाई रोवथे आज नोनी होये बिराने ओ घर के दुवारी ले ददा मोर रोवथे रांध के देवइया बेटी जाथे अपन कुरिया के दुवारी ले भईया मोर रोवथे मन के बोधइया बहिनी जाथे भीतरी के दुवारी भउजी मोर रोवथे लिगरी लगइया नोनी जाथे दाई मोर रोवथे नदिया बहथे ददा रोवय छाती फाटथ हे हाय हाय मोर दाई भईया रोवय समझाथे भउजी नयन कठोरे वो
  8. कभी इंतजार रहता था उनको भी हमारे आने का , हमें बेसब्री रहती थी उनसे मिलने की , लेकिन साल भर बरसात और फ़ागुन का मौसम नहीं रहता , जब कोई गाता हुआ मिले दुवारी पर ” घर आया मेरा परदेशी , प्यास बुझी मेरी अंखियन की , परदेशी भी कहती थी और मेरा भी कहती थी , जाने कब से उन्हे इंतजार था , और कब तक इंतजार करती , अंखियों की प्यास बुझने का , बस शाम से छज्जे पर खड़ी हो जाती , अपनी आंखे सेंकते हुए।
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