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ईश्वरता meaning in Hindi

pronunciation: [ eeshevretaa ]
ईश्वरता meaning in English

Examples

  1. जिसमें ज्ञानादि ऐश्वर्य है , उसे ईश्वर कहना योग्य है और वह ईश्वरता आत्मा का सहजस्वरूप है।
  2. सम्बन्धों की मृदु छाया , आभास करा जाती है ॥ ईश्वरता और अमरता , कुछ माया की सुन्दरता ।
  3. आज भोगों के प्रति तीव्र आसक्ति ही हमें मानवता और उसमें छुपी ईश्वरता से परे ले जा रही है , आध्यात्मिक दृष्टि से हमारा पतन होता जा रहा है।
  4. दीपावली की सारी रात श्वान निद्रा तक सीमित रहती है क्योंकि उषाकाल होते ही घर की कोई स्त्री शूर्पवादन करते हुए घर के कोने-कोने से दरिद्रता का निष्काषन और ईश्वरता का प्रवेशन करती है।
  5. तीनों लोकों से विलक्षण आपकी ईश्वरता है , आप महान शासकों के भी शासक हैं, आप जगत् का तिरोधान करने वाले हैं, आप वेद के द्वारा बताए जाते हैं और चन्द्रशेखर आदि पच्चीस रूप होने पर भी उनसे परे हैं इसलिए आप महेश्वर कहे जाते हैं।
  6. अब देखिये पक्षपात की बातें कि जो मुसलमान के मजहब में नहीं हैं उनको काफ़िर ठहराना , उनमें श्रेष्ठों से भी मित्रता न रखने और मुसलमाना में दुष्टों से भी मित्रता रखने के लिए उपदेश करना ईश्वर को ईश्वरता से बिह : कर देता है।
  7. ४ २ ) समीक्षक- ” जब जिसको चाहता है उसको नीति देता है तो जिसको नहीं चाहता है उसको अनीति देता होगा , यह बात ईश्वरता की नहीं किन्तु जो पक्षपात छोड़ सबको नीति का उपदेश करता है वही ईश्वर और आप्त हो सता है , अन्य नहीं।
  8. मानवीय संघर्ष उस ईश्वरता के भी विरुद्ध यहाँ क्रियाशील और सचेष्ट दीखता है जो हमें छ्ल-छ्द्म सिखाते हैं - “ फिर ये सवाल होगा , क्या मुझसे वक्त जीता ? / तुम सोच रखो उत्तर , तुम ठेके हो सत्य के / जब सामना करेंगे मेरे टुकडे अस्तित्व के ... ” कविता मानवमन में बैठी जड़ता , उसकी रूढ़ि को तोड़ती हुई , सत्य के ठेकेदारों को चुनौती देती हुई उसके युगीन संघर्ष में शामिल होने की प्रेरणा देती है , उसकी जिजीविषा को उकसाती है।
  9. जिन लोगों को मानवता के भीतर रहने वाली ईश्वरता या एकता का अटूट और दृढ़ विश्वास नहीं है , जो दूसरे की ग़लती या कमज़ोरी को केवल उसी की कमज़ोरी या ग़लती मानकर उसमें अपनी जिम्मेदारी महसूस नहीं करते हैं ऐसे लोगों के लिए गाँधीजी की कोई देन नहीं है और अभी समाज में भारी बहुमत ऐसे ही लोगों का है जो सब मनुष्यों को अलग अलग और पृथक मानकर उनके भीतर जो ईश् वरीय एकत्व है उसे स्वीकार नहीं करते और जिनके स्वयं मानने और दूसरों को मनाने के लिए बस भय और लोभ ही मुख्य साधन हैं।
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