भद्दे ढंग से sentence in Hindi
pronunciation: [ bhade dhamga se ]
Examples
- हो सकता है अखबार के मालिकों ने किसी रिपोर्टर की फोटो नहीं छापने का फैसला किया हो, लेकिन ये तो नहीं कहा होगा कि किसी रिपोर्टर का चेहरा भद्दे ढंग से ब्लर कर दो और फिर ग़लती मानने की जगह नीतियों का रोना रोते रहो।
- मैं मिला, कुछ को छोड़कर, स्वीकार सभी व्यापारियों के बारे में हैं जो पूरी तरह से बाजार में लाखों और अरबों व्यापार गढ़े स्वीकार है, भद्दे ढंग से अपने सभी समय शिक्षु पूर्णता में आसान आवंटन गंभीर क्षय, कैसे गिरफ्तार करने के बारे में तरह...
- हो सकता है अखबार के मालिकों ने किसी रिपोर्टर की फोटो नहीं छापने का फैसला किया हो, लेकिन ये तो नहीं कहा होगा कि किसी रिपोर्टर का चेहरा भद्दे ढंग से ब्लर कर दो और फिर ग़लती मानने की जगह नीतियों का रोना रोते रहो।
- पिछली होली के बाद के एक कवि सम्मलेन की यादे ; कवि महोदय जगह-जगह पर सुई धागे से भद्दे ढंग से तुल्पे, सफ़ेद कुर्ता-पजामा पहने, चेहरे पर काफी खिन्नता लिए, गुस्से में मंच पर आये, और माथे का पसीना फोंझते हुए माइक थाम कर कविता गायन करने लगे ;
- जिन्हें सामग्री को संपादित करना, प्रेस कॉपी बनाना और प्रूफ पढ़ना तो क्या, स्वयं अच्छी भाषा लिखना तक नहीं आता था, वे भी संपादक बन बैठे और भद्दे ढंग से छपने वाली, बेशुमार गलतियों वाली, अनियतकालिक रूप से कुछ समय चलकर बंद हो जाने वाली पत्रिकाएँ निकालने लगे।
- संत शिरोमणी ने उज्जैन में अपने हाव-भाव से, बोली बानी से कमला बुआ की जिस भद्दे ढंग से हंसी उड़ाई, उसके उत्तर में कमला बुआ अपनी पर उतर आती तो बापू को भागते रास्ता नहीं मिलता, पर कमला बुआ ने बहुत शलीन ढंंग से, अत्यंत शिष्टतापूर्वक उत्तर में कहा कि मुझे उनका आशीर्वाद चाहिए।
- संत शिरोमणी ने उज्जैन में अपने हाव-भाव से, बोली बानी से कमला बुआ की जिस भद्दे ढंग से हंसी उड़ाई, उसके उत्तर में कमला बुआ अपनी पर उतर आती तो बापू को भागते रास्ता नहीं मिलता, पर कमला बुआ ने बहुत शलीन ढंंग से, अत्यंत शिष्टतापूर्वक उत्तर में कहा कि मुझे उनका आशीर्वाद चाहिए।
- संत शिरोमणी ने उज्जैन में अपने हाव-भाव से, बोली बानी से कमला बुआ की जिस भद्दे ढंग से हंसी उड़ाई, उसके उत्तर में कमला बुआ अपनी पर उतर आती तो बापू को भागते रास्ता नहीं मिलता, पर कमला बुआ ने बहुत शलीन ढंंग से, अत्यंत शिष्टतापूर्वक उत्तर में कहा कि मुझे उनका आशीर्वाद चाहिए।
- बाजारवाद के मर्ज़ से बुरी तरह पीड़ित और अपनी आतंरिक संरचना में सामाजिक संतुलन को भद्दे ढंग से नजरंदाज़ करते एवं सामंती मनोवृति का महीन तरीके से पोषण करने वाले पत्र-पत्रिकाओं से किसी क्रन्तिकारी अप्रोच की उम्मीद की जा सकती है क्या? जब तक हमारा मीडिया जगत इन दोनों ‘बिमारियों' का सही इलाज नहीं करता इस तरह की ‘दुर्घटनाएं' आगे भी होती रहेंगी.
- बाजारवाद के मर्ज़ से बुरी तरह पीड़ित और अपनी आतंरिक संरचना में सामाजिक संतुलन को भद्दे ढंग से नजरंदाज़ करते एवं सामंती मनोवृति का महीन तरीके से पोषण करने वाले पत्र-पत्रिकाओं से किसी क्रन्तिकारी अप्रोच की उम्मीद की जा सकती है क्या? जब तक हमारा मीडिया जगत इन दोनों ‘ बिमारियों ' का सही इलाज नहीं करता इस तरह की ‘ दुर्घटनाएं ' आगे भी होती रहेंगी.